परिषद के बारे में
768 जनजातियों/उप-जनजातियों में फैले, शेष भारत से उपेक्षित, विस्थपित, शॊषित, अशिक्षित अन्धुओं के गौरवशाली अतीत को पुनः स्मरण कराकर, एकात्मभाव की अनुभूति कराने, चैतन्य जगाने स्वालम्बी बनाकर नेतृत्व क्षमता निर्माण कराने, पू0 ठक्कर बापा के मन्तब्य को चरितार्थ करने, प0 रविशंकर शुक्ल, तत्कालीन मुख्यमंत्री (म0 प्र0) के स्वप्न को साकार कर राश्ट्रद्रोहियों के चंगुल से अपने बन्धुओं को मुक्त कराने के उददेष्य से नागपुर (महाराश्ट्र) निवासी पु0 रमाकान्त केषव देषपाण्डे ने प0 पु0 ‘श्रीगुरूजी’ की सद्प्रेरणा और महाराजा बिजय भूषण सिंह देव के आत्मीक सहयोग से सन् 1952 में 5 वनवासी बालकों को लेकर कल्याण आश्रम की नींव पड़ी। वनवासी कल्याण आश्रम, आज विष्व की एक मात्र जनजातीय कल्याण की स्वयंसेवी संस्था है जो विभिन्न प्रकल्पों के माध्यम से वनवासी के विकास, उसकी सनातनी संस्कृति, चैतन्य जागरण एवं परमपराओं के संरक्षणा एवं सम्बर्धन और अस्मिता की रक्षा में उनके पीछे वैसे ही खड़ा है जैसे ऋशिवर विष्वामित्र के यज्ञ की रक्षार्थ, उनके पीछे धनुर्धर श्रीराम खडत्रे थे। कल्याण आश्रम से सम्बद्ध पूर्वी उत्तर प्रदेश की पंजीकृत प्रान्तीय इकाई ‘ सेवा समर्पण संस्थान’ उनके सर्वांगीण विकास में जीवनव्रती कार्यकर्ताओं के माध्यम से सन् 1977-78 से प्रयत्नशील है।











